Book: Sacchi Raah Samarpan Raah (सच्ची राह, समर्पण)
हमारे सभी सदग्रंथ और संत महात्मा इस बात से सहमत हैं कि प्रेम ही परमात्मा का साक्षात् स्वरूप है. जिसे विशुद्ध सच्चे प्रेम की प्राप्ति हो गयी, उसे परमात्मा की प्राप्ति हो गयी.
उपनिषद भी परमात्मा को रसरूप बताते हैं – “रसो वै स:”. प्रेम का निज रूप रसस्वरूप परमात्मा है.इसलिए जैसे परमात्मा सर्वव्यापक है, वैसे ही प्रेम (आनंद) भी सर्वव्यापक है. प्रेम ही गुण है, प्रेम ही भाव है, प्रेम ही हृदय है, प्रेम ही बुद्धि है और प्रेम ही मन है. प्रेम सर्वशक्तिमान है, अथाह महासागरों से भी अगाध है, सहस्रों हिमालयों से भी ऊँचा और अनन्त सृष्टियों से भी अधिक विस्तृत है.
यह पुस्तक परमात्मा को पाने की इसी प्रेम समर्पण राह पर चलने के मार्ग को विस्तार पूर्वक वर्णन करने के लिए है.